Success Stories

अर्जुन नाग की कहानी (ग्राम:- डोडरेपाल जिला बस्तर)


अर्जुन के परिवार की अमदानी का मुख्य ज़रिया खेती, वनोपज तथा मजदूरी था जिससे वह मुश्किल से लगभग 18 हजार से 20 हजार रूपये का आमदनी प्राप्त कर पाता था। वर्ष 2010 में नाबार्ड के वाड़ी परियोजना से जुड़ा जिसके अंर्तगत उसके खेेत में आम और काजु के पौधे लगने थे। परन्तु एक समस्या आ गई, अर्जुन के जमीन पथरिली थी। बामुश्किल एक फीट की गहराई के बाद पत्थर निकल रहे थे। इस तरह की जमीन पर आम और काजू के पौधे लगाना एक चुनौती पूर्ण कार्य था। परंतु अर्जुन बहुत उत्सुक था वह अपने खेतों में पौधे लगाना चाहता था। फिर उसने तीन फीट की जगह पाॅच फीट गहरा गड्ढ़ा खोदा और बाहर से अच्छी मिट्टी लाकर गड्ढे को भरा और पौधें लगाना शुरू कर दिया। आज अर्जुन अपने एक एकड़ की वाड़ी से लगभग 52 हजार से 55 हजार तक की आय प्राप्त कर रहा हैं।

चंदरू की कहानी (ग्राम डिलमिली, जिला बस्तर)


चंदरू का गाॅव बहुत ही पिछड़ी है जमीन रेतीली जिसमें पानी बहुत ही कम समय के लिए रूकता हैं तथा सिंचाई के साधनों की कोई भी व्यवस्था नहीं थीं। जिसमें मुश्किल से एक फसल ही पाता हैं चंदरू थोड़े बहुत खेती एवं मजदुरी करके सालाना लगभग 12 हजार से 15 हजार रूपय तक कमा लेता था।
फिर वह वाड़ी परियोजना से जुड़ा । पहले उसके खेंत में डिजल पंप के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था की गई, फिर आम और काजू के पौधे लगायें गयें। सिचांई व्यवस्था होने के कारण पौधों के बीच में बची जमींन पर सब्जीं की खेतीं भीं करने लगा। धिरे धिरे खेतीं के दुसरे तकनीक जैसे पैंक हाउस, ड्रिप सिंचाई आदि का प्रयोग भी करने लगा। चंदरू अपने वाड़ी से अब लगभग सालाना 40 हजार रूपयें तक कमा लेता हैं। अब वह मजदूरी करने नहीं जाता वह अपनें वाड़ी में ही व्यस्त रहता है। उसने अपने वाड़ी में ही घर बना लिया जिसमें वह अपनी पत्नि के साथ रहता है।

नानी राम की कहानी (ग्राम:- ढ़डरेपाल जिला बस्तर)

नानी राम का गाॅव बहुत ही पिछड़ा है जमींन ज्यादा उपजाऊ नहीं थीं सिंचाई की व्यवस्था भी नहीं थी। जिस कारण केवल थोड़े से जमींन में ही खेतीं हो पाती थीं। वह भी एक ही फसल लिया जा सकता था। अपनी आवश्यकता ही पुर्ति हेतु मजदूरी एवं वनोपज में निर्भर रहना होता था। पहले उसकी आमदनी सालाना लगभग 18 हजार रूपये ही थी।
फिर वह वाड़ी परियोजना से जुड़ा। आज उसके खेत में आम और काजू के पेड़ लगे हैं। बची हुए खाली जगह में सब्जीं का उत्पादन होता है। नानी राम आज अपनी वाड़ी से लगभग सालाना 50 हजार रूपयें तक कमा लेता है।

"मैनें अपने छोटे भाई को मोटरसाइकल खरीद कर दी, जिसकी किस्त मैं अपनी वाड़ी से होने वालें लाभ से चुकाता हुॅ।"
- नानी राम

फगनी और चैती बाई की कहानी (नाबार्ड वाड़ी परियोजना 2009-10, पिथोरा)

ग्राम कोकोभाटा में फगनी ध्रुव तथा चैती बाई का परिवार रहता है | वे अपने खेत में फल्ली, उडद, तथा मुंग की फसल करते थे जिससे लगभग 20 से 22 हजार रुपए वार्षिक तक की आमदनी हो जाती थी | इसके अतिरिक्त वनोपज संग्रहण से 10 से 12 हजार रुपए वार्षिक अतिरिक्त आय प्राप्त होती थी | परन्तु परिवार बड़ा होने के कारण इतनी आय पर्याप्त नहीं हो पता था | परिवार के भरण पोषण के लिए उन्हें दूसरों के खेत तथा अन्यत्र मजदूरी करना पड़ता था |

पिछले 60 वर्षो से शासन की और से किसानों को तरह-तरह के आश्वासन दिए गए किन्तु उन्हें हासिल कुछ भी नहीं हुआ | छत्तीसगढ़ एग्रीकौन समिति के प्रारंभिक संपकों में इन्होने ने भी अपनी असहमति दी किन्तु बार-बार के समझाइश एवं संपर्क के कारण वे वाडी परियोजना में शामिल हुए | प्रशिक्षण एवं क्षेत्र भ्रमण तथा बहार के किसानो से बातचीत के बाद वे कार्यक्रम में पुरे दिल से जुटे |

परियोजना के अतंर्गत उनके खते में आम तथा नींबू के पौधे लगाये गए | साथ ही उतने क्षेत्र में सामुदिक ट्यूबवेल के रूप में सिचांई के साधन तथा फेसिंग की भी व्यवस्था की गई | सिचांई व्यवस्था होने के कारण अब पौधो के बीच में इंटरक्रोपिंग भी होने लगी जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होने लगी |

फगनी ध्रुव तथा चैती बाई का परिवार अब अपने खेत से सालाना 1 लाख रूपए तक आय प्राप्त कर लेते है | खेत में पुरानी तकनीकों को छोडकर नयी तकनीकों का प्रयोग करने लगे | उन्हें खेती के बारे में नयी –नयी जानकारी जैसे खाद तथा दवाई कब डालना है, बीज कौन सा उपयोग करना है, पौधो की देखभाल कैसे करना है आदि की जानकारी हो गई | इस जानकारी का प्रयोग उनकी अगली पीढ़ी भी करने लगी |

“अब मेरी और मेरे पति की उम्र हो गई | हम अब ज्यादा मेहनत नहीं कर पते परन्तु खेत में आम और निम्बू के पौधे और सिचांई की व्यवस्था देख निश्चिन्ता रहती है”
- चैती बाई

छन्नू और जीतेन्द्र की कहानी (नाबार्ड वाड़ी परियोजना 2009-10, पिथोरा)


ग्राम सोनासिल्ली में छन्नू तथा जीतेन्द्र का परिवार रहता है | वे अपने खेत में फल्ली, उडद, तथा मुंग की फसल करते थे जिससे लगभग 20 से 22 हजार रूपए तक की आमदनी हो जाती थी | इसके अतिरिक्त वनोपज संग्रहण से 5 से 8 हजार रूपए अतिरिक्त आय प्राप्त होती थी | इसके अतिरिक्त आय का कोई स्रोत नहीं होने के कारण परिवार के भरण पोषण के लिए उन्हें दूसरों के खेत तथा अन्यत्र मजदूरी करना पड़ता था|

पिछले 60 वर्षो से शासन की और से किसानों को तरह-तरह के आश्वासन दिए गए किन्तु उन्हें हासिल कुछ भी नहीं हुआ | छत्तीसगढ़ एग्रीकौन समिति के प्रारंभिक संपकों में इन्होने ने भी अपनी असहमति दी किन्तु बार-बार के समझाइश एवं संपर्क के कारण वे वाडी परियोजना में शामिल हुए | प्रशिक्षण एवं क्षेत्र भ्रमण तथा बहार के किसानो से बातचीत के बाद वे कार्यक्रम में पुरे दिल से जुटे |

“किसान किसान को देखकर सीखता है उसे भरोसा होता है |”
- जीतेन्द्र

परियोजना के अंतर्गत उनके खेत में आम के 23 तथा नींबू के 40 पौधे लगाये गए | साथ ही उतने क्षेत्र में सामुदिक ट्यबूवेल के रूप में सिचांई के साधन तथा फेंसिंग की भी व्यवस्था की गई | सिचांई व्यवस्था होने के कारण अब पौधो के बीच में सब्जी की खेती भी होने लगी | फेंसिंग हो जाने से खते में ही बकरी पालन तथा मुर्गी पालन भी होने लगा जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होने लगी |

छन्नू तथा जीतेन्द्र का परिवार अब अपने खते से 40 नींबू के पौधो से सालाना 40 हजार तथा आम से सालाना 30 हजार रूपए तक आय प्राप्त कर लेते है | आम तथा नींबू वे स्थानीय बाजार, पिथोरा तथा महासमुंद में आसानी से बेच देते है | सब्जी की खेती तथा मुर्गी और बकरी पालन से अतिरिक्त 40 हजार रूपए सालाना आय हो जाती है | खेत में पुरानी तकनीकों को छोडकर नयी तकनीकों का प्रयोग करने लगे | उन्हें खेती के बारे में नयी - नयी जानकारी जैसे खाद तथा दवाई कब डालना है, बीज कौन सा उपयोग करना है, पौधो की देखभाल कैसे करना है आदि की जानकारी हो गई | इस जानकारी का प्रयोग उनकी अगली पीढ़ी भी करने लगी |

चूँकि परियोजना के पहले इनके खते बंजर पड़े थे, परियोजना के कारण भूमि सुधार, सिचांई के साधन तथा फेंसिंग के कारण इनकी जमीन की कीमत बढ़ गई |

“पहले हमारे जमीन का दाम 70 से 80 हजार रूपए एकड़ था अब लगभग 2 लाख रूपए हो गई”
- श्री छन्नू